कुछ हफ़्तों तक, रोहन ने अपने 'मिठाईवाला' के भेष को पूरी तरह अपना लिया. सुबह जल्दी उठना, घर पर नमकीन और जलेबियाँ पैक करना (जो अब समीर की देखरेख में एक छोटे से किचन में प्रोफेशनल शेफ द्वारा तैयार की जाती थीं), और फिर अपनी पुरानी साइकिल पर बेंगलुरु की सड़कों पर निकल पड़ना – यह उसकी दिनचर्या बन गई थी. उसने जानबूझकर अनन्या की गली को अपने "नियमित रूट" में शामिल कर लिया था.
हर सुबह, वह अनन्या के बंगले के पास से गुज़रता, अपनी घंटी बजाता और ज़ोर से आवाज़ लगाता. कभी अनन्या की माँ बाहर आतीं, कभी नौकरानी, और कभी-कभी खुद अनन्या भी. रोहन ने देखा कि अनन्या सुबह की सैर पर जाती थी, अक्सर एक किताब हाथ में लिए बगीचे में बैठती थी, और कभी-कभी अपने कुत्ते के साथ खेलती थी. ये छोटे-छोटे अवलोकन उसे उसके कॉर्पोरेट जीवन की बड़ी-बड़ी मीटिंग्स से ज़्यादा दिलचस्प लगने लगे थे.
एक दिन, जब रोहन अनन्या के घर के पास था, उसने देखा कि अनन्या अपने बगीचे में कुछ पौधों को पानी दे रही थी. वह एक साधारण टी-शर्ट और ट्रैक पैंट में थी, उसके बाल बिखरे हुए थे, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी. रोहन ने अपनी साइकिल रोकी और अपनी आवाज़ को थोड़ा और मधुर बनाया. "ताज़ी जलेबी! गरमा गरम समोसे!"
अनन्या ने ऊपर देखा और मुस्कुराई. "ओह, आप फिर आ गए? आज क्या ख़ास है?"
"मैम, आज मेरी स्पेशल 'केसर जलेबी' है," रोहन ने कहा, और एक डिब्बा खोला. "एक बार चख कर देखिए, आप भूल जाएँगी सारी दुनिया." उसने अपनी आवाज़ में थोड़ा मज़ाक मिलाया, यह देखने के लिए कि अनन्या कैसे प्रतिक्रिया करती है.
अनन्या हँस पड़ी. "अच्छा, इतनी तारीफ़? ठीक है, एक प्लेट केसर जलेबी दे दो."
जब रोहन उसे जलेबी दे रहा था, अनन्या ने अचानक पूछा, "आप रोज़ इसी गली में आते हैं?"
"जी मैम," रोहन ने तुरंत जवाब दिया, "यही मेरा रूट है. यहाँ के लोग मेरी नमकीन बहुत पसंद करते हैं." उसने अपनी बात को सामान्य रखने की कोशिश की.
"अच्छा," अनन्या ने कहा, "आपकी जलेबी सच में अच्छी है. घर पर बनाते हैं क्या?"
"जी मैम, घर पर ही बनाते हैं," रोहन ने कहा, और उसे लगा कि वह झूठ बोल रहा है. "मेरी दादी की रेसिपी है." यह झूठ नहीं था, उसकी दादी सच में अच्छी जलेबी बनाती थीं, बस अब वे नहीं रहीं थीं.
अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "तो आपकी दादी की रेसिपी कमाल की है." उसने पैसे दिए और अंदर चली गई.
रोहन को एक अजीब सी खुशी महसूस हुई. अनन्या से सीधे बात करना, उसकी मुस्कान देखना, और उसकी तारीफ सुनना – यह सब उसके लिए एक नया अनुभव था. उसे लगा कि वह सिर्फ़ एक दुल्हन नहीं ढूँढ रहा था, बल्कि एक इंसान को जानने की कोशिश कर रहा था.
लेकिन तभी, उसकी खुशी एक झटके में ग़ायब हो गई.
गली के मोड़ से एक चमचमाती स्पोर्ट्स कार गुज़री और अनन्या के बंगले के सामने आकर धीमी हो गई. कार की खिड़की नीचे हुई और अंदर से एक परिचित चेहरा बाहर झाँका – विक्रम, रोहन का पुराना कॉलेज फ्रेंड और अब एक प्रतिद्वंद्वी टेक कंपनी का सीईओ. विक्रम ने रोहन को देखा, लेकिन उसकी नज़रें बस एक पल के लिए उस पर ठहरीं, और फिर वह अनन्या के बंगले की ओर देखने लगा.
रोहन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा. विक्रम उसे पहचान सकता था! उसने तुरंत अपनी टोपी और नीचे खिसका ली और अपनी साइकिल को थोड़ा और मोड़ लिया, ताकि उसका चेहरा कम दिखे. उसने अपने डिब्बों को तेज़ी से समेटना शुरू किया, जैसे उसे कहीं जल्दी पहुँचना हो.
विक्रम ने कार पार्क की और बंगले की ओर बढ़ा. रोहन ने देखा कि विक्रम ने अनन्या के दरवाज़े की घंटी बजाई, और कुछ ही देर में अनन्या बाहर निकली. वे दोनों मुस्कुराए और विक्रम ने अनन्या को एक फूलों का गुलदस्ता दिया.
रोहन ने अपनी साइकिल पर बैठकर तेज़ी से पैडल मारे. उसे लगा जैसे उसके पेट में कुछ अजीब सा हो रहा था – जलन, या शायद कुछ और. विक्रम और अनन्या? क्या वे एक-दूसरे को जानते थे? क्या विक्रम भी अनन्या से शादी के लिए इच्छुक था?
उसने अपनी साइकिल को तेज़ी से मोड़ लिया और गली से बाहर निकल गया. उसका 'मिठाईवाला' का भेष अब उतना मज़ेदार नहीं लग रहा था. यह खेल जितना उसने सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा जटिल होने वाला था. उसे अब सिर्फ़ अनन्या को जानना नहीं था, बल्कि उसे 'विक्रम' जैसे प्रतिद्वंद्वियों से भी निपटना था, जो शायद उसी की तरह, या उससे भी ज़्यादा, अनन्या को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे.
रोहन ने महसूस किया कि यह सिर्फ़ एक 'भेष' नहीं था, यह एक दौड़ थी, और उसे अपनी चालें और भी तेज़ी से चलनी होंगी.
to be continued.......
- Brij
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