विक्रम को अनन्या के बंगले से निकलते हुए देखने के बाद, रोहन की रातों की नींद उड़ गई थी. सिर्फ़ व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता ही नहीं, बल्कि एक अजीब सी निजी ईर्ष्या उसके अंदर पनप रही थी.
अगली सुबह, वह समीर के साथ अपने पेंटहाउस में बैठकर चाय पी रहा था, लेकिन उसके दिमाग में वही दृश्य घूम रहे थे.
"यार समीर, विक्रम उस गली में क्या कर रहा था?" रोहन ने परेशान होकर पूछा. "कहीं वह भी...?"
समीर ने अपनी दाढ़ी खुजाई. "क्यों नहीं? अनन्या सिर्फ़ खूबसूरत ही नहीं है, उसके पिता एक बड़े आर्किटेक्ट हैं, उनका अच्छा खासा नाम है. विक्रम जैसा महत्वाकांक्षी आदमी, जो हर चीज़ में नंबर वन रहना चाहता है, उसके लिए यह एक अच्छा 'प्रोजेक्ट' हो सकता है." समीर ने 'प्रोजेक्ट' शब्द पर ज़ोर दिया, यह जानते हुए कि रोहन को यह पसंद नहीं आएगा.
"प्रोजेक्ट नहीं," रोहन ने कहा, "वह एक इंसान है, समीर!"
"हाँ, तो तुम भी तो उसी इंसान को जानने के लिए मिठाईवाला बने फिर रहे हो," समीर ने मज़ाक किया. "फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि वह अपने असली रूप में जा रहा है, और तुम धूल फाँक रहे हो."
समीर की बात में सच्चाई थी, लेकिन रोहन को यह कड़वी लगी. उसने तय किया कि उसे और तेज़ी से काम करना होगा. उसे सिर्फ़ ऑब्ज़र्वेशन नहीं, बल्कि कुछ और चाहिए था.
अगले कुछ दिनों में, रोहन ने अपने 'मिठाईवाला' के रूट में कुछ बदलाव किए. अब वह सिर्फ़ सुबह ही नहीं, बल्कि शाम को भी उस गली में पहुँचने लगा. उसने देखा कि अनन्या शाम को अपने पालतू कुत्ते 'बग्गी' के साथ पार्क में जाती थी. रोहन ने अपनी साइकिल पार्क के पास खड़ी की, और वहीं अपनी मिठाई और नमकीन बेचने लगा.
एक शाम, जब अनन्या बग्गी के साथ टहल रही थी, बग्गी अचानक रोहन की साइकिल के पास दौड़ आया और उसके पैर चाटने लगा. रोहन ने मुस्कुराते हुए बग्गी के सिर पर हाथ फेरा.
"बग्गी!" अनन्या ने उसे आवाज़ दी और फिर रोहन के पास आई. "माफ़ करना, यह थोड़ा शरारती है."
"कोई बात नहीं, मैम," रोहन ने कहा. "इसे नमकीन की खुशबू पसंद आ गई होगी." उसने एक छोटा सा बिस्किट का टुकड़ा निकाला और बग्गी को दिया.
अनन्या ने देखा और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई. "आप जानवरों से भी इतने प्यार से पेश आते हैं?"
"जी मैम," रोहन ने कहा, "इंसानों से तो मुश्किल है, जानवरों से तो हो ही जाता है." उसने हल्का सा मज़ाक किया.
अनन्या फिर से हँसी, एक खुली और खुशमिज़ाज हँसी. "सही कहा. आजकल लोग पता नहीं क्यों इतनी जल्दी बदल जाते हैं." उसकी आवाज़ में एक हल्की सी उदासी थी.
रोहन ने महसूस किया कि यह एक मौका है. "ऐसा क्यों कह रही हैं मैम?"
अनन्या ने एक गहरी साँस ली. "बस... लोग जो दिखते हैं, अक्सर वो होते नहीं. खासकर जब शादी की बात आती है. बायोडाटा कुछ और कहता है, मुलाक़ात कुछ और दिखाती है, और असलियत... पता नहीं." उसकी आँखों में एक अनिश्चितता थी, जो रोहन के अपने सवालों से मिलती-जुलती थी.
रोहन को लगा जैसे अनन्या भी इसी 'दिखावे' से जूझ रही थी. उसने कहा, "मैम, कुछ लोग होते हैं जो सच में जानना चाहते हैं. पर ज़माना ही ऐसा है कि सब दिखावे में जीते हैं."
"हाँ," अनन्या ने कहा, "लेकिन मुझे लगता है कि हर दिखावे के पीछे एक सच छिपा होता है. बस उसे ढूँढने की ज़रूरत होती है."
उनकी बात अधूरी रह गई, क्योंकि तभी पार्क के दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ आई, "अनन्या! तुम कहाँ हो?"
यह विक्रम था. वह स्पोर्ट्स वियर में था और उसकी ओर आ रहा था. रोहन ने देखा कि विक्रम ने उसे एक पल के लिए देखा, जैसे उसे कुछ अजीब लगा हो, लेकिन फिर उसने ध्यान नहीं दिया.
"ओह, मुझे जाना होगा," अनन्या ने कहा. "आपकी बातों में समय का पता ही नहीं चला." उसने रोहन को एक छोटी सी, लेकिन सार्थक मुस्कान दी और बग्गी को लेकर विक्रम की ओर चली गई.
रोहन ने उन्हें दूर जाते हुए देखा. विक्रम अनन्या से कुछ कह रहा था, और अनन्या हँस रही थी. रोहन को एक टीस सी महसूस हुई. उसे लगा कि वह सिर्फ़ एक भेष में नहीं, बल्कि एक दौड़ में भी था.
उसी रात, रोहन ने समीर को फ़ोन किया. "समीर, मुझे लगता है अनन्या को भी कुछ ऐसा ही चाहिए जैसा मुझे चाहिए. वह दिखावे से थक चुकी है."
"और विक्रम?" समीर ने पूछा.
रोहन ने एक लंबी साँस ली. "मुझे नहीं पता. लेकिन मुझे अब और तेज़ी से काम करना होगा. अब यह सिर्फ़ जानना नहीं, बल्कि उसे जीतना भी है, उसके विश्वास को हासिल करना है."
उसे पता था कि अब दाँव पर केवल एक 'परफेक्ट मैच' नहीं, बल्कि उसके अपने दिल के जज़्बात भी थे. और इस खेल में, उसका 'मिठाईवाला' का भेष उसकी सबसे बड़ी ताकत भी था और सबसे बड़ी कमज़ोरी भी. उसे नहीं पता था कि यह खेल उसे किस मोड़ पर ले जाएगा, लेकिन वह पीछे हटने वाला नहीं था.
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- Brij
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