सरोज का सच
अगली सुबह हवेली में एक अजीब-सी खामोशी थी। मानो सब कुछ किसी तूफान से पहले थम गया हो। मीहिर और फ्लोरा दोनों सामान्य व्यवहार कर रहे थे, लेकिन उनकी बातों में कुछ छिपा था।
मैंने नाश्ते के बाद शांता बाई से सीधे सवाल किया, “सरोज कौन था?”
वो कुछ पल तक चुप रहीं। फिर बर्तन धोते हुए बोलीं, “सरोज... बहुत साल काम किया इस हवेली में। मृणाल बाबू के पापा के ज़माने से। बच्चों से खास लगाव था... पर वो लगाव एक हद से आगे चला गया।”
“क्या मतलब?”
“कहा जाता है कि... वो मीहिर को अपने जैसा बनाना चाहता था। हर वक़्त उसे अपने साथ रखता। अनुशासन के नाम पर मारता, डराता। और जब मृणाल बाबू को पता चला, तो उसे निकाल दिया गया। एक हफ्ते बाद... उसने इसी बाग़ के आम के पेड़ से लटककर जान दे दी।”
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“फ्लोरा और मीहिर तब बहुत छोटे थे... पर कहते हैं, उस रात के बाद से मीहिर बदल गया।”
मैंने उस दोपहर फिर से डायरी पढ़ी।
21 जून
"मीहिर अब मुझसे दूर रहने लगा है। कल रात मैंने उसे किसी से बात करते सुना—कमरे के अंदर, अकेले। आवाज़ भारी थी, जैसे कोई और भी बोल रहा हो। मैंने दरवाज़ा खोला, पर वहाँ कोई नहीं था।"
23 जून
"शांता बाई मुझसे कुछ छुपा रही हैं। मीहिर की आँखों में अजीब चमक है। फ्लोरा अब सरोज का नाम लेकर हँसती है। ऐसा लगता है जैसे वो लोग इस खेल में मेरे खिलाफ हैं। या शायद मुझे ही पागल बनाया जा रहा है?"
उस रात मैंने तय किया कि मैं सरोज के आम के पेड़ के पास जाऊँगी।
चाँदनी में बाग़ भूतिया लग रहा था। पुराने आम के पेड़ की डालियाँ हवा में हिल रही थीं, लेकिन हवा नहीं थी।
जैसे ही मैं पास पहुँची, मुझे लगा कि कोई मेरे पीछे खड़ा है।
मैंने पलटकर देखा—कोई नहीं था।
पर तभी एक फुसफुसाहट सुनाई दी:
“तुम भी उसे ले जाओगी? जैसे अनुजा ने ले जाना चाहा?”
मैंने मुड़कर देखा—पेड़ की एक ऊँची शाखा पर एक धुंधली परछाईं झूल रही थी। उसकी आँखें जल रही थीं... और वो सीधा मुझे देख रही थी।
अंतिम रात
उस रात मेरी नींद नहीं आई।
मैंने सरोज की परछाईं को सच में देखा था — ये अब कोई भ्रम नहीं रहा। ये हवेली, ये बच्चे, और अनुजा की डायरी... सब कुछ अब जुड़ने लगा था। मगर अब सवाल यह था — अनुजा के साथ क्या हुआ? क्या वो सचमुच चली गई थी? या उसे जाने ही नहीं दिया गया?
मैंने डायरी के आखिरी पन्ने पलटे। कुछ शब्द धुंधले थे, जैसे लिखते वक्त हाथ काँप रहा हो।
27 जून
"मीहिर अब सरोज की तरह दिखने लगा है। उसका चेहरा वैसा नहीं रहा जैसा पहले था। कल रात उसने कहा—'तुम यहाँ से नहीं जा सकती, अनुजा दीदी। सरोज अंकल को तुम पसंद नहीं आईं।'
"मैंने शांता बाई से कहा कि मुझे जाना है, पर उन्होंने कहा—'अब देर हो चुकी है। वो तुम्हें जाने नहीं देंगे।' मैं डर गई हूँ। बहुत डर गई हूँ। अगर मैं कल सुबह तक ना निकली... तो शायद कभी नहीं निकल पाऊँगी।"
बस। डायरी यहीं खत्म हो गई।
मैंने अगले दिन शांता बाई से डायरी दिखाई। उनका चेहरा पीला पड़ गया।
“आपने ये कहाँ से पाई?” उन्होंने कांपते स्वर में पूछा।
“उसी कमरे से जहाँ अनुजा दी,” मैं रुक गई, “या शायद उसे मारा गया।”
शांता बाई की आँखों में आँसू थे। “मैं कुछ नहीं कर पाई... मुझे सब पता था... लेकिन उस रात बिजली चली गई थी। हवेली में अँधेरा था। और फिर मैंने सीढ़ियों से गिरने की आवाज़ सुनी। दौड़कर पहुँची... पर अनुजा गायब थी। बस उसकी चप्पलें पड़ी थीं, और कमरा खुला था...”
रात फिर आई।
बिजली फिर गई।
और बच्चों के कमरे से हँसी की अजीब-सी गूंज आने लगी।
मैं भागती हुई कमरे तक पहुँची। मीहिर और फ्लोरा दोनों ज़मीन पर गोला बनाकर बैठे थे। बीच में जलती थी अगरबत्ती... और एक पुरानी तस्वीर — सरोज की।
मीहिर ने मेरी ओर देखा और धीरे से बोला—
"अब तुम जाओगी नहीं, दीदी... अब तुम हमारी हो।"
और तभी, कमरे का तापमान गिर गया।
तस्वीर अपने आप उठी... और मेरी ओर फेंकी गई।
मैं चीखना चाहती थी—but मेरा गला बंद हो गया।
कमरे की खिड़की अपने आप बंद हो गई। और दीवार पर उभरने लगे खून से लिखे शब्द—
“अनुजा आई थी... तुम रहोगी।”
दो आत्माएँ
मैं बेहोश नहीं हुई, लेकिन मेरा शरीर सुन्न हो गया था। कमरे में हवा भारी थी, जैसे कोई बहुत पुरानी सच्चाई साँस ले रही हो।
मीहिर और फ्लोरा अब भी उस तस्वीर को निहार रहे थे। सरोज की आँखें जैसे दीवारों से झाँक रही थीं।
मैं किसी तरह हिम्मत जुटाकर उठी और बाहर भागी।
बाहर आते ही हवा बदल गई। मैं सीधा उस कमरे में पहुँची जहाँ अनुजा की डायरी मिली थी। भीतर अँधेरा था, लेकिन अब मैं डर नहीं रही थी। अब मुझे जवाब चाहिए थे।
मैंने दीपक जलाया और दीवार पर हाथ फेरा... तभी एक ठंडी हवा मेरे पास से गुज़री। कमरे का तापमान गिरा। और मेरे कानों में एक धीमा स्वर गूंजा—
“गौरी... मुझे यहाँ से निकलने में मदद करो।”
मैंने पलटकर देखा।
वह थी... अनुजा की आत्मा।
सफ़ेद साड़ी, उलझे बाल, पर चेहरा शांत।
“उन्होंने मुझे मारा नहीं,” उसने कहा, “मुझे डराकर इस हवेली में बंद कर दिया। मेरी आत्मा इस घर की दीवारों में कैद है। और अब वो बच्चों को भी बाँध रहे हैं।”
“कौन?” मैंने पूछा।
“सरोज... और... माया।”
“माया?”
अनुजा ने बताया, “सरोज अकेला नहीं था। वो माया के साथ मिलकर बच्चों को ‘शुद्ध’ बनाने का नाटक करता था। माया एक पूजा पद्धति में विश्वास करती थी जिसमें आत्मा को वश में किया जाता था। फ्लोरा और मीहिर उस वक़्त बहुत छोटे थे। और उनकी मासूम मानसिकता को उन्होंने जकड़ लिया।”
मैं समझ गई—यह लड़ाई सिर्फ सरोज की आत्मा से नहीं थी, बल्कि माया की काली ऊर्जा से भी थी।
“मैं क्या कर सकती हूँ?” मैंने पूछा।
अनुजा ने मेरी ओर एक छोटा-सा लोहे का ताबीज़ बढ़ाया।
“इस ताबीज़ को बच्चों के कमरे में छुपा दो। और एक बार जब माया और सरोज का प्रभाव टूटेगा, तब मैं मुक्त हो सकूँगी... और बच्चे भी।”
रात गहराती जा रही थी।
मैंने ताबीज़ को लिया, और मन में एक संकल्प किया—अब या कभी नहीं।
मैं दबे पाँव बच्चों के कमरे की ओर बढ़ी...
लेकिन कमरे की दहलीज़ पर ही कोई खड़ा था।
फ्लोरा।
उसकी आँखें अब भी मासूम थीं, लेकिन उनमें अब एक अनजानी ठंडक थी।
“दीदी,” उसने कहा, “ताबीज़ रखने से कुछ नहीं होगा... अब आप भी हमारी होंगी।”
अंतिम मुक्ति
फ्लोरा मेरी आँखों में देख रही थी। उसकी मासूमियत अब एक मुखौटा लग रही थी। उसके पीछे कमरे के अंदर सरोज की तस्वीर टंगी थी—अब वह तस्वीर नहीं, एक दरवाज़ा बन चुकी थी। एक ऐसा दरवाज़ा जो आत्माओं की दुनिया की ओर खुलता था।
मैंने कांपते हाथों से ताबीज़ कसकर पकड़ा।
फ्लोरा बोली, “दीदी, अगर आप ताबीज़ रखती हैं... तो अनुजा दीदी हमेशा के लिए चली जाएगी। क्या आप चाहती हैं कि हम फिर अकेले हो जाएँ?”
उसकी आवाज़ में एक दर्द था—या शायद एक जाल।
तभी मीहिर ने पीछे से कहा, “दीदी, जल्दी कीजिए। वो आ रही है... माया।”
कमरा ठंडी धुंध से भर गया। दीवारें कंपन करने लगीं। सरोज की तस्वीर से एक तेज़ चीख निकली—जैसे कोई आत्मा अपने पिंजरे में छटपटा रही हो।
और फिर... एक काली परछाईं दरवाज़े से निकली।
माया।
उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, चेहरा अस्पष्ट था, पर उसकी आँखें जल रही थीं।
“तुमने अनुजा को बचाने की कोशिश की...” माया की आवाज़ में गूँज थी, “...अब तुम भी यहीं रहोगी।”
मैंने झट से ताबीज़ को बच्चों के पलंग के नीचे रखा और मन्त्र दोहराने लगी, जो अनुजा ने सिखाया था:
“ज्योतिर्मय शुद्ध आत्मा, तिमिर को करे नाश।
बंधन टूटे, जीवन छूटे, सत्य करे प्रकाश।”
माया की चीख गूंज उठी—कमरे की खिड़कियाँ टूटने लगीं। सरोज की परछाईं धुँधली होने लगी। बच्चे अब बेहोश हो चुके थे। और उसी पल अनुजा की आत्मा एक तेज़ रौशनी में प्रकट हुई।
“अब तुम मुक्ति पा सकती हो,” मैंने कहा।
अनुजा मुस्कराई। उसकी आँखों में संतोष था।
“तुमने उन्हें बचा लिया, गौरी। अब इस हवेली को जीवन मिल सकता है... बिना डर के।”
और फिर, माया और सरोज की आत्माएँ एक चक्रवात में बंधकर कमरे से बाहर निकल गईं। हवेली की दीवारें थम गईं। हवाएँ शांत हो गईं। और कमरे में पहली बार सचमुच की शांति छा गई।
सुबह, मीहिर और फ्लोरा उठे तो उन्हें कुछ याद नहीं था। बस इतना कहा:
“हमने अजीब सपना देखा, दीदी... जैसे कोई परी आई थी और हमें भूतों से बचा लिया।”
मैंने मुस्कराकर सिर हिला दिया।
मैंने अनुजा की डायरी आखिरी बार पढ़ी। अब उसके शब्द फीके हो चुके थे।
और तब मैंने वो डायरी हवेली के पुराने नीम के नीचे दफना दी।
मासूम परछाइयाँ अब अतीत बन चुकी थीं।
- Brij
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