पहली दस्तक
मैंने जब पहली बार उस हवेली की तस्वीर देखी, तो मन में कुछ अजीब-सी हलचल हुई। वह कोई आलीशान महल नहीं था, पर उसमें कुछ था—एक गूढ़ शांति, जो या तो सुकून देती थी या बेचैनी बढ़ा देती थी।
मेरा नाम गौरी वर्मा है। मैं मनोविज्ञान में मास्टर्स कर चुकी हूँ और दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल में काउंसलर रही हूँ। पर जब मुझे मुंबई के एक प्रसिद्ध उद्योगपति मृणाल सेठी का प्रस्ताव मिला कि मैं उनके दो अनाथ भतीजे-भतीजी की देखरेख के लिए सतारा के पास उनके फार्महाउस में रहूं, तो मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। शायद मुझे भी एक बदलाव की ज़रूरत थी।
मृणाल ने मुझसे साफ शब्दों में कहा, "मुझे बच्चों से कोई लगाव नहीं है, मिस वर्मा। मैं चाहता हूँ कि आप उन्हें पूरी तरह से संभालें। कोई परेशानी हो, आप खुद तय करें। मुझे फोन न करें।"
बात थोड़ी कठोर थी, लेकिन पेशेवर दृष्टि से मुझे स्वतंत्रता का भरोसा मिला।
जब मैं रामगढ़ हवेली पहुँची, तो हवा में अजीब-सी ठंडक थी, जबकि मार्च का महीना था। एक पुरानी लेकिन भव्य हवेली, जिसके चारों ओर आम और नीम के घने पेड़ थे। दरवाज़े पर एक वृद्ध सेविका, शांता बाई, खड़ी थी। चेहरे पर मुस्कान थी लेकिन आंखों में छिपी थकान भी।
“आइए गौरी दीदी,” वह बोली, “बच्चे आपसे मिलने के लिए बहुत उत्साहित हैं।”
अंदर घुसते ही एक अजीब-सी घुटन महसूस हुई। ऐसा लगा जैसे घर में हवा तो है, लेकिन साँस नहीं ली जा सकती।
फ्लोरा, आठ साल की प्यारी सी लड़की, पहली नजर में बिल्कुल मासूम लगी। और मीहिर, बारह साल का लड़का, कुछ ज्यादा ही गंभीर। उसकी आँखों में वो मासूमियत नहीं थी जो उम्र के साथ होनी चाहिए।
“नमस्ते गौरी दीदी,” दोनों ने एक साथ कहा। लेकिन मीहिर की आवाज़ में कुछ था—एक ऐसा आत्मविश्वास जो बच्चों में नहीं होता। एक झलक में ही उसने मुझे पढ़ लिया।
पहली रात मैंने बच्चों को सुला दिया और हवेली का थोड़ा जायज़ा लेने निकली। बरामदे में एक पुराना झूला हिल रहा था, बिना हवा के। शायद शांता बाई ने छू दिया होगा—मैंने खुद को समझाया।
लेकिन तभी ऊपरी मंज़िल की खिड़की पर एक परछाईं दिखी।
कोई था... या शायद नहीं?
मैंने गहरी साँस ली और सोने चली गई। मन ही मन सोचा—"शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ।"
पर मुझे नहीं पता था कि यह सिर्फ शुरुआत थी...
हवेली के रहस्य
सुबह की किरणें जब पुराने शीशों से छनकर कमरे में आईं, तो एक पल को सब कुछ सामान्य लगा। जैसे रात की सारी बेचैनी बस एक सपना थी।
मैं बच्चों को बगीचे में पढ़ाने ले गई। मीहिर हमेशा किताबों में आगे रहता था, लेकिन फ्लोरा हर छोटी चीज़ पर चकित होती—पत्तियों का गिरना, एक तितली का उड़ना, या मिट्टी में रेंगती चींटियाँ।
“गौरी दीदी,” फ्लोरा ने अचानक पूछा, “क्या भूत सच में होते हैं?”
मैं चौंकी। “तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?”
वो मुस्कराई, “कुछ नहीं। मीहिर ने कहा कि यहाँ पहले जो आया था, उसे रात में किसी ने देखा... पर उसने बताया नहीं कौन।”
मीहिर दूर बैठा, किताब पढ़ने का नाटक कर रहा था, लेकिन उसकी नज़र हम पर थी।
शाम को जब शांता बाई मुझे चाय दे रही थीं, मैंने पूछा, “इस हवेली में पहले कौन आया था बच्चों की देखभाल के लिए?”
वो पल भर को रुकीं। फिर धीरे से बोलीं, “एक लड़की थी—अनुजा। सीधी-सादी, भोली। बच्चों से बहुत लगाव था उसे। पर...”
“पर क्या?” मैंने पूछा।
शांता बाई ने खिड़की की तरफ देखा, जैसे कोई सुन रहा हो।
“एक रात अचानक चली गई। किसी को कुछ बताया नहीं। बस एक चिट्ठी छोड़ गई—‘मुझे वो चीज़ें फिर दिखने लगी हैं।’ उसके बाद कोई खबर नहीं मिली उसकी।”
मेरे हाथ से चाय की प्याली फिसलते-फिसलते बची।
रात को नींद देर से आई। और आई भी तो टूटी हुई।
किसी के कदमों की आवाज़... छत से आती धीमी फुसफुसाहट... और खिड़की के बाहर फिर वही परछाईं।
इस बार मैं डरकर नहीं छुपी।
मैं उठी, टॉर्च ली, और ऊपर की मंज़िल पर गई।
जहां वो पुराना कमरा था, जिसके दरवाज़े पर ताला लगा था।
पर उस रात वो ताला खुला हुआ था।
कमरे में घुसते ही एक तीखी ठंडक महसूस हुई। दीवारों पर जाले, फर्श पर धूल... लेकिन एक कोने में रखी एक छोटी सी डायरी चमक रही थी। ऐसे जैसे उसे किसी ने अभी-अभी रखा हो।
मैंने डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो शायद तुम भी वही देख रही हो जो मैंने देखा था…”
अनुजा की डायरी
कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई थी। मैं काँपती उंगलियों से डायरी का अगला पन्ना पलटने लगी।
10 जून
"मैंने सोचा था कि ये बच्चे सामान्य हैं। मीहिर बहुत चुप है, पर समझदार। फ्लोरा प्यारी है, लेकिन कुछ तो है जो छुपा हुआ है इन दोनों में। मुझे लगता है कि वो किसी से बात करते हैं... कोई जिसे मैं नहीं देख सकती।"
14 जून
"रात को मीहिर की नींद में बड़बड़ाहट सुनी। वो बार-बार एक नाम ले रहा था—'सरोज'। शांता बाई ने कहा, वो पुराना नौकर था—कुछ अजीब था उसमें। पर वो दो साल पहले मर गया। फिर मीहिर उसका नाम क्यों ले रहा है?"
17 जून
"मैंने फ्लोरा को उस पुराने कुएं के पास देखा, अकेली। वो किसी से बात कर रही थी, पर वहाँ कोई नहीं था। जब मैंने पूछा, उसने कहा—‘सरोज अंकल मज़ाक कर रहे थे।’ मुझे ठंड लगने लगी है, जून की गर्मी में भी।"
मैंने डायरी बंद कर दी। कुछ देर वहीं बैठी रही, फिर धीरे-धीरे नीचे आई। शांता बाई अब पूजा कर रही थीं। अगर उन्हें बताया तो शायद वो कुछ कहें... या शायद डर जाएं।
रात को मीहिर मेरे पास आकर बोला, “आपने वो कमरा खोल लिया?”
मैं चौंकी, “तुम्हें कैसे पता?”
वो मुस्कराया, जैसे किसी बड़े राज़ पर पकड़ हो। “वो नहीं चाहते कि आप वहाँ जाएं।”
“कौन नहीं चाहते?” मैंने पूछा।
उसने धीरे से कहा—“वो जो यहाँ थे... और अब भी हैं।”
रात एक बार फिर बेचैन थी। हवेली की दीवारों से जैसे कोई साँसें ले रहा था। कमरे में अजीब-सी गंध भर गई थी—पुरानी लकड़ी और किसी सड़े हुए गुलाब की।
मैंने खिड़की बंद करने की कोशिश की, लेकिन वो खुद-ब-खुद खुल गई।
बाहर अंधेरे में किसी की परछाईं झूलती दिखी—जैसे किसी ने खुद को पेड़ से लटका लिया हो...
...और उसी पल मीहिर की आवाज़ आई:
“सरोज अंकल अब भी यहीं रहते हैं। उन्हें कोई भूल नहीं सकता।”.
To be continue....................
- Brij

Comments
Post a Comment