बेंगलुरु की सड़कें सुबह की आपाधापी में सराबोर थीं. एक तरफ़ तेज़ रफ़्तार गाड़ियाँ धूल उड़ाती गुज़र रही थीं, तो दूसरी तरफ़ पैदल चलने वालों की भीड़ थी. इसी सब के बीच, रोहन मल्होत्रा, जो अब एक साधारण 'मिठाईवाला' बना हुआ था, अपनी पुरानी साइकिल के पैडल मार रहा था. उसके कंधे दुखने लगे थे, और हाथ में पकड़ी घंटी को लगातार बजाने से कलाई में दर्द होने लगा था.
"नमकीन ले लो! गरमा गरम नमकीन!" उसकी आवाज़, जिसे वह जानबूझकर थोड़ा मोटा और ज़ोरदार बनाए हुए था, गली में गूँज रही थी. यह उसकी 'नई पहचान' थी, जो उसे एक अरबपति से एक मामूली विक्रेता में बदल चुकी थी.
शुरुआत में उसे अजीब लगा. लोग उसे अनदेखा कर रहे थे, या फिर अजीब नज़रों से देख रहे थे. कुछ ने उसे रोका भी, लेकिन मोल-भाव ऐसा करते कि उसे शर्मिंदगी महसूस होती. एक छोटी बच्ची ने तो यहाँ तक कह दिया, "अंकल, आपकी मिठाई के डिब्बे तो बहुत गंदे हैं." रोहन को अपनी महंगी कारों और साफ़-सुथरे ऑफ़िस की याद आई, जहाँ हर चीज़ चमकती रहती थी.
लेकिन धीरे-धीरे, उसने खुद को ढालना शुरू कर दिया. उसे पता चला कि मोल-भाव कैसे करना है, किस तरह से अपनी आवाज़ को दूर तक पहुँचाना है, और कैसे ग्राहकों को आकर्षित करना है. यह एक अलग ही दुनिया थी, जो उसके कॉर्पोरेट जीवन से बिल्कुल भिन्न थी. यहाँ कोई मीटिंग नहीं थी, कोई प्रेजेंटेशन नहीं था, बस सीधी सादी बिक्री और ग्राहक से जुड़ाव था.
करीब एक घंटे बाद, वह उस ख़ास गली में पहुँचा, जहाँ अनन्या का घर था. यह एक शांत, हरे-भरे पेड़ों से घिरा इलाका था, जहाँ बड़े-बड़े बंगले थे. रोहन ने साइकिल धीमी की और अपनी नज़रें घर की तलाश में लगा दीं.
उसे वह घर मिल गया – एक सुंदर, आधुनिक शैली का बंगला जिसके सामने एक छोटा सा बगीचा था. रोहन ने साइकिल वहीं पास में एक पेड़ के नीचे खड़ी की और अपने डब्बों को नीचे रखा. उसने अपनी आवाज़ को थोड़ा और ज़ोरदार किया. "ताज़ी जलेबी! गरमा गरम समोसे! ले लो!"
कुछ देर इंतज़ार करने के बाद, बंगले के अंदर से एक अधेड़ उम्र की महिला बाहर निकलीं, शायद अनन्या की माँ. उनके चेहरे पर हल्की सी थकान थी, लेकिन वे शालीन लग रही थीं. "क्या-क्या है तुम्हारे पास, बेटा?" उन्होंने पूछा.
रोहन ने तुरंत अपने डिब्बे खोल दिए. "मैम, घर की बनी ताज़ी जलेबी है, क्रिस्पी समोसे हैं, और स्पेशल काजू कतली है." उसने अपनी मीठी से मीठी आवाज़ निकालने की कोशिश की.
महिला कुछ मिठाइयाँ देख ही रही थीं, तभी घर के अंदर से एक आवाज़ आई, "माँ, क्या ले रही हो?"
और फिर, अनन्या बाहर निकली. उसने एक आरामदायक सूती कुर्ता पहन रखा था और उसके बाल ढीले बंधे थे. उसकी आँखों में सुबह की नींद की हल्की सी खुमारी थी, लेकिन उनमें वही चमक थी जो रोहन ने उसकी औपचारिक मुलाकात में देखी थी.
अनन्या ने पहले रोहन पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे ही वह नमकीन के पास आई, उसकी नज़रें रोहन के चेहरे पर ठहरीं. रोहन ने अपनी टोपी थोड़ी नीचे खिसका ली, लेकिन उसे लगा जैसे अनन्या की आँखें उसके अंदर तक झाँक रही थीं.
"ओह, मिठाईवाला!" अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "सुबह-सुबह कौन आता है इतनी मिठाई बेचने?" उसकी आवाज़ में हल्का मज़ाक था, लेकिन वह मधुर लग रही थी.
रोहन ने अपनी सबसे अच्छी 'नम्र मिठाईवाला' वाली मुस्कान दी. "मैम, सुबह का ताज़ा माल ही सबसे अच्छा होता है. एक बार चख कर देखिए, आप रोज़ बुलाएँगी."
अनन्या ने एक समोसा उठाया. "ठीक है, एक प्लेट समोसे दे दो, और थोड़ी जलेबी भी." उसने रोहन को पैसे दिए. उसकी उंगलियाँ हल्की सी छू गईं, और रोहन को एक अजीब सी सिहरन हुई.
जब वह पैसे ले रहा था, उसने देखा कि अनन्या के कुर्ते पर एक छोटी सी मिट्टी की दाग़ थी, जैसे वह अभी-अभी बगीचे में काम करके आई हो. उसने एक पल के लिए देखा कि अनन्या अपने पालतू कुत्ते, एक शरारती गोल्डन रिट्रीवर, के साथ हंसी-मजाक कर रही थी. ये छोटे-छोटे पल थे जो उसके बायोडाटा में कभी नहीं थे, और ये रोहन को ज़्यादा वास्तविक लग रहे थे.
जब अनन्या और उसकी माँ अंदर चली गईं, रोहन ने साइकिल पर बैठकर एक गहरी साँस ली. यह अनुभव उतना मुश्किल नहीं था जितना उसने सोचा था. और जो छोटे-छोटे अवलोकन उसने किए थे, वे किसी भी औपचारिक मीटिंग से कहीं ज़्यादा अनमोल थे.
"तो," रोहन ने खुद से कहा, "अनन्या को समोसे पसंद हैं, और वह बागवानी भी करती है."
वह मुस्कुराया. यह पहला कदम था, और उसे लगा कि यह 'अनोखा भेष' उसे अपनी तलाश में और भी मदद करेगा. अभी तो यह खेल शुरू ही हुआ था.
to be continued.........
- Brij
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