सेंट्रल कमांड सेंटर में सुबह हो चुकी थी, लेकिन शिबानी ने एक पल के लिए भी अपनी सीट नहीं छोड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं, लेकिन उनमें दृढ़ संकल्प की चमक अभी भी बरकरार थी। मिस्टर वर्मा, जिन्होंने रात भर वहीं बिताई थी, अब कुछ थके हुए लग रहे थे, लेकिन उनकी उम्मीद शिबानी पर टिकी थी।
"फोरेंसिक टीम का क्या हुआ, सर? क्या उन्हें उस धातु के टुकड़े से कुछ मिला?" शिबानी ने पूछा, उसकी आवाज़ में बेसब्री थी।
तभी, एक जूनियर अधिकारी दौड़ता हुआ आया। "मैम, फोरेंसिक टीम ने रिपोर्ट भेज दी है! वह धातु का टुकड़ा एक पुराने रेलवे बैच का हिस्सा है, जो १९९० के दशक में रेलवे के कुछ विशिष्ट कर्मचारियों को दिया जाता था, खासकर उन लोगों को जो सिग्नलिंग और संचार विभाग में काम करते थे।"
शिबानी की भौंहें तन गईं। "तो यह एक अंदरूनी व्यक्ति है, या कोई ऐसा व्यक्ति जो रेलवे के इतिहास से बहुत अच्छी तरह वाकिफ है।"
"और मैम," अधिकारी ने आगे कहा, "बैच पर एक विशिष्ट कोड है। यह कोड सिर्फ़ एक विशेष विभाग के कर्मचारियों को दिया जाता था, जो अब निष्क्रिय हो चुका है - 'रेलवे ऑटोमेशन और सुरक्षा इकाई'।"
शिबानी के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। रेलवे ऑटोमेशन और सुरक्षा इकाई! यह वही विभाग था जिसने दशकों पहले पुराने सिग्निलिंग सिस्टम को डिज़ाइन किया था और जिसे नए डिजिटल सिस्टम के आने के बाद भंग कर दिया गया था।
"उस इकाई के सभी पूर्व कर्मचारियों की सूची निकालो! खासकर उन लोगों की, जिन्हें हाल ही में किसी कारण से रेलवे से निकाला गया था, या जिनके पास कोई शिकायत थी!" शिबानी ने तुरंत निर्देश दिया।
मिस्टर वर्मा ने अपने माथे पर हाथ फेरा। "यह बहुत बड़ा काम है, शिबानी। उस इकाई में सैकड़ों लोग थे।"
"हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है, सर! हमलावर ने हमें अपने बारे में एक बड़ा सुराग दिया है। हमें उसे पकड़ना होगा," शिबानी ने दृढ़ता से कहा।
जूनियर अधिकारी ने तुरंत डेटाबेस खंगालना शुरू किया। कुछ ही देर में, उसे एक नाम मिला जो शिबानी की आँखों में अटक गया। "मैम, एक नाम है - 'रविंद्र कुमार'। वह इस इकाई का एक वरिष्ठ इंजीनियर था, जिसे पाँच साल पहले भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था। उसने रेलवे के खिलाफ कई मुकदमे भी दायर किए थे।"
शिबानी ने रविंद्र कुमार की प्रोफ़ाइल खोली। उसकी आँखें तस्वीर पर टिकीं - एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, जिसकी आँखों में गहरी निराशा और क्रोध था। और फिर, उसे एक और बात याद आई। रविंद्र कुमार का चेहरा... वह नकाबपोश व्यक्ति के वीडियो में धुंधले सिल्हूट से मिलता-जुलता था।
"रविंद्र कुमार," शिबानी ने बुदबुदाया। "यही वह है।"
"क्या तुम निश्चित हो, शिबानी?" वर्मा जी ने पूछा।
"हाँ, सर। वह रेलवे के पुराने और नए दोनों सिस्टम को जानता है, उसे बाहर कर दिया गया था, और उसके पास बदला लेने का मकसद है। और उस बैच का टुकड़ा... यह सब उसी की ओर इशारा कर रहा है," शिबानी ने कहा। "हमें उसे तुरंत ढूंढना होगा।"
तभी, हेडसेट पर इंस्पेक्टर राजेश की आवाज़ आई। "मैम, हमें USB ड्राइव की फोरेंसिक रिपोर्ट मिल गई है। उसमें एक मैलवेयर है, लेकिन साथ ही एक एन्क्रिप्टेड फ़ाइल भी है। हमारी टीम उसे डिक्रिप्ट करने की कोशिश कर रही है।"
"उसे डिक्रिप्ट करो, इंस्पेक्टर! मुझे लगता है कि उसमें रविंद्र कुमार की अगली योजना का विवरण हो सकता है!" शिबानी ने निर्देश दिया।
शिबानी ने तुरंत RPF को रविंद्र कुमार के पते और उसके सभी ज्ञात ठिकानों पर छापेमारी करने का आदेश दिया। उसे पता था कि रविंद्र कुमार बहुत खतरनाक था, और वह अभी भी आज़ाद था। भारत एक्सप्रेस पर हमला सिर्फ़ एक शुरुआत थी। असली खतरा अभी भी मंडरा रहा था।
शिबानी ने अपनी मुट्ठी भींच ली। यह सिर्फ़ एक हैकर को पकड़ने की बात नहीं थी, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति को रोकने की बात थी जो अपने बदले की आग में पूरे रेलवे सिस्टम को जलाना चाहता था।
रविंद्र कुमार के पते पर RPF की टीम तेज़ी से पहुँची। यह मुंबई के एक शांत उपनगरीय इलाके में एक साधारण-सा अपार्टमेंट था। रात के इस पहर में, इमारत में सन्नाटा पसरा हुआ था। RPF इंस्पेक्टर ने अपनी टीम को दरवाज़े पर तैनात किया और फिर ज़ोर से दस्तक दी। कोई जवाब नहीं आया।
"मैम, कोई जवाब नहीं दे रहा है। दरवाज़ा बंद है," इंस्पेक्टर ने शिबानी को हेडसेट पर बताया।
"दरवाज़ा तोड़ दो, इंस्पेक्टर! वह अंदर हो सकता है, या उसने कोई जाल बिछाया हो," शिबानी ने निर्देश दिया।
RPF टीम ने दरवाज़ा तोड़ दिया और सावधानी से अपार्टमेंट में प्रवेश किया। अंदर का नज़ारा अस्त-व्यस्त था। बिखरे हुए कागज़ात, कंप्यूटर के पुर्ज़े और खाने के पैकेट, सब कुछ इस बात का गवाह था कि कोई यहाँ जल्दबाजी में काम कर रहा था।
"मैम, अपार्टमेंट खाली है। रविंद्र कुमार यहाँ नहीं है," इंस्पेक्टर ने निराशा से कहा। "लगता है वह भाग गया।"
शिबानी ने अपनी मुट्ठी भींच ली। "उसने हमें चकमा दिया। लेकिन उसने कुछ निशान छोड़े होंगे। हर चीज़ की तलाशी लो, खासकर किसी भी डिजिटल उपकरण की।"
RPF टीम ने अपार्टमेंट की गहन तलाशी शुरू की। उन्हें एक पुराना लैपटॉप मिला, जो चालू था, लेकिन उसकी स्क्रीन पर एक चेतावनी संदेश चमक रहा था - 'डेटा वाइप हो रहा है'।
"मैम! यहाँ एक लैपटॉप है, और उसका डेटा मिटाया जा रहा है!" इंस्पेक्टर ने चिल्लाकर कहा।
"उसे तुरंत बंद करो, इंस्पेक्टर! किसी भी तरह से उसकी पावर सप्लाई काट दो! हमें कोई भी डेटा चाहिए!" शिबानी ने निर्देश दिया।
RPF अधिकारी ने तुरंत लैपटॉप की बैटरी निकाली और पावर केबल खींच दी। लैपटॉप बंद हो गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि कितना डेटा बचाया जा सका था।
इसी बीच, सेंट्रल कमांड सेंटर में, जूनियर एनालिस्ट ने खुशी से चिल्लाया। "मैम! USB ड्राइव डिक्रिप्ट हो गई है!"
शिबानी तुरंत उसके पास पहुँची। "क्या मिला?"
एनालिस्ट ने स्क्रीन पर एक फ़ाइल खोली। यह एक विस्तृत योजना थी, जिसमें भारतीय रेलवे के पूरे नेटवर्क पर एक समन्वित साइबर हमले का विवरण था। इसमें विभिन्न स्टेशनों पर सिग्निलिंग सिस्टम को हाईजैक करने, ट्रेनों को पटरी से उतारने की कोशिश करने और नाशिक स्टेशन पर एक बड़े पैमाने पर बिजली गुल करने की योजना शामिल थी।
"यह तो एक पूर्ण युद्ध है!" मिस्टर वर्मा ने घबराकर कहा। "वह पूरे देश को पंगु बनाना चाहता है!"
"और देखिए, मैम! यहाँ एक तारीख और समय दिया गया है," एनालिस्ट ने एक विशिष्ट पंक्ति की ओर इशारा किया। "अगले २४ घंटों के भीतर, नाशिक स्टेशन पर। यह एक टाइमर है!"
शिबानी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। रविंद्र कुमार ने सिर्फ़ भारत एक्सप्रेस पर हमला नहीं किया था; यह उसकी बड़ी योजना का सिर्फ़ एक परीक्षण था। उसका असली लक्ष्य पूरे भारतीय रेलवे सिस्टम को ध्वस्त करना था, और वह नाशिक स्टेशन से शुरुआत करने वाला था।
"उसने हमें चकमा दिया, लेकिन उसने हमें अपनी योजना का ब्लूप्रिंट दे दिया," शिबानी ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। "हमें तुरंत सभी रेलवे ज़ोन को अलर्ट करना होगा। सभी सिग्निलिंग हब की सुरक्षा बढ़ानी होगी, और नाशिक स्टेशन पर विशेष ध्यान देना होगा।"
"लेकिन हम उसे कैसे रोकेंगे, शिबानी? वह कहीं भी हो सकता है!" वर्मा जी ने पूछा।
शिबानी ने रविंद्र कुमार के लैपटॉप से बचाए गए डेटा की ओर देखा। "उसने डेटा मिटाने की कोशिश की, लेकिन शायद कुछ बचा हो। हमें उस लैपटॉप की तुरंत फोरेंसिक जाँच करनी होगी। शायद उसमें उसके ठिकाने या उसके सहयोगियों के बारे में कोई सुराग हो।"
"और इंस्पेक्टर राजेश," शिबानी ने हेडसेट पर कहा, "रविंद्र कुमार के अपार्टमेंट से कोई भी व्यक्तिगत सामान या दस्तावेज़ इकट्ठा करो। हमें उसकी आदतों, उसके संपर्कों, उसके पैटर्न को समझना होगा।"
शिबानी को पता था कि यह एक विशाल कार्य था, लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था। रविंद्र कुमार एक खतरनाक दुश्मन था, जो अपने बदले की आग में अंधा हो चुका था। उसे रोकना अब सिर्फ़ एक नौकरी नहीं थी, बल्कि एक दौड़ थी - समय के खिलाफ, और एक ऐसे दुश्मन के खिलाफ जो देश को घुटनों पर लाना चाहता था। शिबानी ने अपनी मुट्ठी भींच ली। यह लड़ाई अब व्यक्तिगत हो चुकी थी, और वह इसे जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी।
To be continued...........
- Brij

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