अध्याय एक: पता नहीं
मुंबई की सुबह हमेशा साफ़ नहीं होती।
कभी वह समुद्र की नमकीन हवा लेकर आती है, कभी ट्रैफिक की गर्म सांस, और कभी किसी अनकहे डर की हल्की-सी गंध।
उस दिन भी सुबह ऐसी ही थी।
लोकमान्य तिलक अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर चायवाला स्टील के गिलास खड़खड़ा रहा था। ऑटो वालों की कतार के पीछे एक साइकिल वाला अख़बार बांटते-बांटते गला फाड़कर किसी राजनीतिक बहस की खबर सुना रहा था। और उसी शोर के बीच, तीसरी मंज़िल के कॉरिडोर में, एक लड़की खिड़की के पास खड़ी थी जैसे उसने अपने भीतर के सारे शब्द खिड़की के बाहर फेंक दिए हों।
उसका नाम अनाया था।
उम्र सत्ताईस के आसपास, पर चेहरा ऐसा जैसे पिछले छह महीनों ने उसे छत्तीस का बना दिया हो। बाल जल्दी में बाँधे थे। आँखों के नीचे हल्की स्याही-सी थकान। हाथ में एक पुरानी फ़ाइल थी, जिसमें उसके कुछ काग़ज़, एक मोबाइल, एक अधखुला लिफ़ाफ़ा और बच्चे की रिपोर्ट रखी थी। मोबाइल पर बार-बार वही नाम चमकता, फिर बुझ जाता "राघव"।
राघव मेहरा।
वह आदमी जिसने तीन महीने पहले कहा था, “मैं बस एक हफ्ते के लिए दिल्ली जा रहा हूँ। वहाँ का काम खत्म होते ही लौट आऊँगा।”
और फिर…
और फिर जैसे हवा में घुल गया।
पहले उसका फोन स्विच ऑफ़ आया।
फिर नंबर बंद।
फिर व्हाट्सऐप पर डीपी ग़ायब।
फिर इंस्टाग्राम अकाउंट।
फिर वह जिम का बैग, जो अनाया के कमरे के कोने में अब भी पड़ा था, मानो उसका मालिक किसी भी पल वापस आकर कह देगा “अरे, यहीं रखा था न।”
लेकिन वह नहीं आया।
अब अनाया की बाँहों में जो बच्ची थी, उसका नाम उसने अभी तक तय नहीं किया था।
नहीं, तय किया था, कई बार।
कभी सारा।
कभी नूर।
कभी मीरा।
लेकिन हर नाम के पीछे राघव की अनुपस्थिति ऐसी चिपक जाती कि कुछ भी पूरा नहीं लगता। बच्ची सो रही थी, मुट्ठियाँ बंद किए। इतनी छोटी कि अनाया को डर लगता अगर वह ज़ोर से सांस लेगी तो कहीं यह नन्ही ज़िंदगी बिखर न जाए।
“मैडम, ओपीडी की रिपोर्ट लेनी है?”
नर्स ने पास आकर पूछा।
अनाया ने सिर हिलाया। “हाँ… अभी।”
नर्स ने मुस्कराते हुए उसके हाथ पर एक नज़र डाली, जहाँ हल्की सूजन थी। “पहला बच्चा?”
अनाया ने जवाब देने से पहले खिड़की के बाहर देखा। नीचे सड़क पर किसी ने हॉर्न बजाया। एक स्कूटर वाले ने हेलमेट की पट्टी खींचते हुए मोबाइल कान से दबा रखा था। शहर जैसे किसी बड़े, अधीर जीव की तरह फड़फड़ा रहा था।
“हाँ,” उसने कहा। “पहला।”
“नाम सोच लिया?”
“सोच रही हूँ।”
नर्स चली गई।
अनाया ने काग़ज़ों वाला लिफ़ाफ़ा खोला। उसके भीतर एक पर्ची थी, हाथ से लिखा हुआ, काले पेन से, जल्दी में।
उस पर सिर्फ एक पता था:
कमरा 17, तीसरी मंज़िल, शिवशंकर पेइंग गेस्ट हाउस, कोलाबा
नीचे मोबाइल नंबर था।
वह नंबर अब बंद था।
अनाया की उँगलियाँ उस पर्ची पर कुछ देर रहीं।
कमरा 17।
जैसे कोई सचमुच वहाँ रहता हो।
जैसे किसी के पास एक कमरे से बाहर निकलने के बाद भी लौट आने का रास्ता हो।
वह पर्ची उसे चार महीने पहले दी गई थी, जब राघव ने मुस्कराकर कहा था, “यहाँ अभी मत आना। घरवाले हैं, कुछ उलझन है। तुम समझ रही हो न?”
और वह समझ गई थी।
या कम-से-कम समझना चाहती थी।
उस वक़्त वह समझदार नहीं थी।
वह सिर्फ़ प्यार में थी।
प्यार में लोग कई बार पते नहीं पूछते।
वे आवाज़ पर भरोसा कर लेते हैं।
हाथ की गर्मी पर।
एक वादा पर।
एक “कल” पर।
और जब “कल” नहीं आता, तो आदमी नहीं, उसकी परछाईं भी बहुत कुछ छोड़ जाती है।
अनाया की नज़र पास खड़ी कुर्सी पर गई। वहाँ एक औरत बैठी थी, उम्र शायद पचास के आसपास, माथे पर सिंदूर, हाथ में पूजा की थाली, और चेहरे पर वह बेचैनी जो भारत में लगभग हर दूसरी माँ के चेहरे पर कभी न कभी लिखी जाती है। वह अपनी बहू के लिए आई थी, लेकिन अब लगातार अनाया को देख रही थी। शायद इसलिए कि अकेली लड़की, बिना किसी पुरुष के, अस्पताल में बच्चे के साथ हो तो समाज के भीतर का जासूस तुरन्त जाग जाता है।
“बेटी,” उस औरत ने आखिर पूछा, “अकेली हो?”
अनाया ने हल्की मुस्कान दी। “अभी तो हाँ।”
औरत ने कुछ न समझते हुए भी सिर हिला दिया, मानो यह उत्तर काफी हो।
बाहर लोहे के गेट से एक आवाज़ आई किसी ने उसका नाम पुकारा।
“अनाया!”
वह चौंककर मुड़ी।
कॉरिडोर के दूसरे सिरे पर उसका दोस्त कबीर खड़ा था। आईटी कंपनी में काम करता था, हमेशा जैसे किसी दूसरे समय से भागकर आया हो, हाफ़ी जीन्स, झुकी हुई कमीज़, आँखों पर चश्मा, और चेहरे पर वह असहजता जो असल में चिंता की परिष्कृत भाषा होती है।
“तू यहाँ?” उसने धीरे से कहा, उसके पास आते हुए। “मैंने मैसेज देखे। क्या हुआ?”
अनाया ने बच्ची को और कसकर पकड़ा। “वो नहीं आया।”
कबीर ने कुछ नहीं पूछा।
वह राघव को पसंद नहीं करता था, लेकिन अब उसका नाम लेने का कोई अर्थ नहीं था।
कुछ लोग रिश्तों में होते हुए भी कमरे से बाहर खड़े रहते हैं। कबीर शुरू से ऐसा ही था देखता, समझता, और चुप रहता।
“उसका कोई और नंबर?” उसने पूछा।
“सब बंद हैं।”
“ऑफिस?”
“वह ऑफिस नहीं जाता था। फ्रीलांस कहता था।”
“घर?”
“उसने घर का पता कभी दिया ही नहीं।”
कबीर ने साँस ली। “तो?”
अनाया ने पहली बार उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में क्रोध नहीं था। न रोना। बस एक खाली, ठंडी चीज़ थी, जैसे किसी ने भीतर की कुर्सी उठा ली हो।
“तो मैं जाऊँगी,” उसने कहा।
“कहाँ?”
“जहाँ भी उसकी परछाईं मिली हो।”
कबीर ने उसे घूरा। “तू मज़ाक कर रही है?”
“नहीं।”
“अभी बच्ची हुई है, अनाया।”
“इसीलिए।”
यह उत्तर इतना सीधा था कि कबीर चुप हो गया।
थोड़ी देर बाद, वह उसे अस्पताल के बाहर तक छोड़ आया। अनाया ने टैक्सी रोकी, पर फिर रुक गई। टैक्सी की पिछली सीट पर बैठने से पहले उसने एक बार अस्पताल की इमारत को देखा। वहाँ बहुत सारे बच्चे आए थे, बहुत सारे नाम रखे गए थे, बहुत सारे वादे निभाए या तोड़े गए थे। कोई नहीं जानता था कि किस कमरे में किसका भविष्य रखा है।
उसने ड्राइवर से पूछा, “कोलाबा चलेंगे?”
ड्राइवर ने रियरव्यू मिरर में उसकी बच्ची को देखा। “चलेंगे, मैडम। ट्रैफिक है, मगर चलेंगे।”
टैक्सी चल पड़ी।
काँच के बाहर शहर पीछे सरकने लगा।
दादर की भीड़।
काले-पीले ऑटो।
गेटवे की तरफ़ जाने वाली सड़क।
सी लिंक के बोर्ड।
पुराने बिल्डिंग्स की बालकनियों पर टंगी शर्टें।
मोबाइल टावरों के बीच खड़े पेड़ों के पत्ते।
मुंबई, जहाँ हर चीज़ किसी न किसी को ढूँढ रही होती है और कोई न कोई हर चीज़ से बच रहा होता है।
अनाया ने बच्ची के माथे पर उँगली रखी।
वह उठी नहीं।
बस हल्की-सी सांस ली।
“तुम्हारा पिता,” वह बहुत धीमे से बोली, “कहाँ छिप गया?”
टैक्सी के सामने रेड सिग्नल था। ड्राइवर ने ब्रेक लगाया।
गाड़ी रुक गई।
अनाया की नज़र सामने की सड़क पर ठहर गई, एक इमारत की दीवार पर बड़ा-सा विज्ञापन लगा था:
डिजिटल इंडिया: हर किसी का पता, हर किसी का हिसाब
वह हँसना चाहती थी।
हँसी नहीं आई।
उसके फोन पर तभी एक अनजान नंबर से कॉल चमका।
वह चौंकी।
एक पल के लिए सांस रुक गई।
उसने स्क्रीन देखा।
कॉलर आईडी पर सिर्फ़ एक नाम था:
शिवशंकर पेइंग गेस्ट
उसने उँगली हिचकते हुए स्क्रीन पर रखी।
और यहीं, उसी पल, जैसे कोई पुरानी फ़िल्म का फ्रेम अचानक नए रंगों में टूटने लगे, अनाया को पहली बार लगा कि राघव शायद गायब नहीं हुआ है।
वह छिपा है।
और अगर छिपा है, तो किसी वजह से।
उसने कॉल उठाई।
“हैलो?”
दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर एक बूढ़ी, काँपती आवाज़ आई:
“क्या आप राघव मेहरा को ढूँढ रही हैं?”
अनाया के पूरे शरीर में बिजली-सी दौड़ गई।
टैक्सी फिर चल पड़ी थी, मगर उसे लगा जैसे समय एकदम रुक गया हो।
“हाँ,” उसने फुसफुसाकर कहा।
उधर से वही आवाज़ फिर आई, बहुत धीमे, बहुत साफ़:
“तो जल्दी आइए। क्योंकि कोई और भी उसे ढूँढ रहा है।”
और कॉल कट गई।
To be continued..................

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