कुछ हफ़्तों तक, रोहन ने अपने 'मिठाईवाला' के भेष को पूरी तरह अपना लिया. सुबह जल्दी उठना, घर पर नमकीन और जलेबियाँ पैक करना (जो अब समीर की देखरेख में एक छोटे से किचन में प्रोफेशनल शेफ द्वारा तैयार की जाती थीं), और फिर अपनी पुरानी साइकिल पर बेंगलुरु की सड़कों पर निकल पड़ना – यह उसकी दिनचर्या बन गई थी. उसने जानबूझकर अनन्या की गली को अपने "नियमित रूट" में शामिल कर लिया था. हर सुबह, वह अनन्या के बंगले के पास से गुज़रता, अपनी घंटी बजाता और ज़ोर से आवाज़ लगाता. कभी अनन्या की माँ बाहर आतीं, कभी नौकरानी, और कभी-कभी खुद अनन्या भी. रोहन ने देखा कि अनन्या सुबह की सैर पर जाती थी, अक्सर एक किताब हाथ में लिए बगीचे में बैठती थी, और कभी-कभी अपने कुत्ते के साथ खेलती थी. ये छोटे-छोटे अवलोकन उसे उसके कॉर्पोरेट जीवन की बड़ी-बड़ी मीटिंग्स से ज़्यादा दिलचस्प लगने लगे थे. एक दिन, जब रोहन अनन्या के घर के पास था, उसने देखा कि अनन्या अपने बगीचे में कुछ पौधों को पानी दे रही थी. वह एक साधारण टी-शर्ट और ट्रैक पैंट में थी, उसके बाल बिखरे हुए थे, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी. रोहन न...